Gavaskar Ne Record Toda : SHARAD JOSHI

गावस्कर ने रेकार्ड तोड़ा : शरद जोशी

जब गावस्कर ने ब्रेडमेन का रेकार्ड तोड़ा, देश के कई खिलाड़ियों ने अपने आप से एक सवाल किया- यह काम मैंने क्यों नहीं किया? मैंने क्यों नहीं तोड़ा ब्रेडमेन का रेकार्ड? यह प्रश्न अपने आप से पूछने वालों में एक मैं भी हूँ। क्यों शरद, जो काम गावस्कर ने किया वह तुमने क्यों नहीं किया?
कारण व्यक्तिगत है। मैं क्या कहूँ कि यह निष्ठुर समाज दोषी है जिसने मुझे गावस्कर नहीं बनने दिया। सच यह है कि पिच पर बल्ला हाथ में लिए, एक या दो रन बनाने के बाद मैं हेमलेट हो जाता था। सामने से बाल आती। मैं मन ही मन सोचता, टु बी आर नाट टू बी, पीटूँ कि नहीं पीटूँ। एक-दो रन बनाकर ही स्वयं से प्रश्न करने लगता- शरद तुम कहाँ हो? क्या कर रहे हो? सामने खड़े लोगों में कौन तुम्हारा मित्र है और कौन शत्रु?
क्रिकेट के मैदान में बल्ला लिये खड़े मुझे विश्वास नहीं होता कि जो मेरे सामने तन कर बल्ला लिये खड़ा है, वह तो मेरा साथी है। और जो ठीक पीछे नम्र मुद्रा में पीठ झुकाए खड़ा है वह मेरा प्राणघाती शत्रु है। ज़रा सोचिये, जो मित्र है वह सामने खड़ा है। जो शत्रु है वह पीठ के पीछे है। मेरे रनआउट होने के लिए मित्रो, इतना ही काफी है।
चारों तरफ फील्डर्स खड़े हैं। मुझे लगता, मेरे प्रशंसक खड़े हैं। वे बड़ी अपेक्षा से मेरी ओर देखते कि मैं गेंद को हिट करूंगा। मैं उत्साह में कर भी देता और वे कैच ले लेते। कर्म की प्रेरणा से बड़ा घोटाला हो जाता था मित्रो! जिन्हें मैं अपना समझता था, वे पराये निकलते। मुझमें एक और मानवीय गुण था। मैं गेंद को हिट करने के बाद दौड़ता नहीं था। अपनी पीटी गेंद को दूर तक जाते देखना मुझे अच्छा लगता था। ऐसे सुन्दर और सुहाने दृश्य को विकेट के बीच दौड़ कर गँवाना मुझे अच्छा नहीं लगता था। चारों तरफ से लोग चिल्लाते- दौड़ उल्लू, दौड़। मगर एक सुंदर गेंद को दूर तक जाते देखना कितना सुखद होता है, यह तो मुझ जैसा व्यक्ति ही समझ सकता है, जो बल्लेबाज होने का साथ अच्छा दर्शक भी था।
वे भी क्या दिन थे! धुआँधार नान-स्टाप क्रिकेट होता था। क्रिकेट अनिश्चितता का खेल है, यह बात सारा मुहल्ला जानता था। सुबह जब हम खेलने उतरते थे तो कोई नहीं जानता था कि किसकी खिड़की का काँच फूटेगा, किसके कंधे पर गेंद लगेगी। अच्छे क्रिकेट के लिए घर के सामने सड़क जितनी चैड़ी होनी चाहिए थी, उतनी थी नहीं। इसका लाभ भी था। गावस्कर जितनी दूरी तक गेंद मारकर एक रन बनाता है, उतने में हम चार बना लेते। विकेट के बीच की दूरी भी कम थी। आख़िर विकेटकीपर के खड़े रहने के लिए भी तो कुछ जगह निकालनी थी। वो क्या पीछे नाली में खड़ा रहता?
ब्रेडमेन का रेकार्ड मेरे द्वारा तोड़े जाने का सवाल ही नहीं था। हमारी टीम में बुधवार को कितने स्कोर बनाए थे, गुरुवार को याद नहीं रहता था। अगर मैं कहूँ कि अमुक दिन सेंचुरी बनाई तो सब कहते थे- तुमने कभी सेंचुरी नहीं बनाई। आरंभिक संघर्ष के दिन थे। मेरे लिए तो वे ही अंतिम थे।
अंपायर से मेरे संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। वो मेरा बेटा इसी उतावली में रहता कि कब मैं आउट होऊँ तो कब वह उंगली उठाए। वह बालर को कभी नहीं कहता था कि टाइट गेंद मत फेंक। भई, रन नहीं बनाने देना है तो मुझे बुलाया ही क्यों? मुझे समूची व्यवस्था अपने विरोध में खड़ी जान पड़ती थी। मैं बल्ला हाथ में ले उस तंत्र के सामने स्वयं को बड़ा अकेला और असहाय अनुभव करता था।
अपनी निगाह में मैं अच्छा ओपनर था। मगर हमारी टीम में सभी अपनी निगाह में अपने को अच्छा ओपनर समझते थे। कई बार खेल इसीलिए देर तक शुरू नहीं हो पाता था कि ओपन कौन करेगा। मेरी विशेषता यह थी कि रन चाहे न बना पाऊँ, एक बार ओपनर हो जाने के बाद मेरा क्लोज़ होना मुश्किल हो जाता था। क्रिकेट की भाषा में जिसे कहें- एक छोर पर जमे रहना। मैं दोनों छोर पर जमा रहता। जब सामने वाला खिलाड़ी सिंगल बनाता, तभी मैं यह छोर छोड़ता। जाकर दूसरे पर खड़ा हो जाता।
मुझमें और गावस्कर में खिलाड़ी के नाते बड़ा फर्क है। वह नई बाल पर आउट हो जाता है, मैं पुरानी पर ही हो जाता हूँ। कई बार वह नई पर भी नहीं होता। मैंने तो नई बाल ओपनर होने को बावजूद नहीं देखी। हमारे मुहल्ले में एक ही बाल थी, जिसे हम निरंतर अपनी पतलून पर घिसकर चमक बनाए रखते थे। पतलून चमकने लगता था, बाल फिर भी नहीं चमकती थी।
आज सभी खिलाड़ी अपने आप से पूछते हैं कि मैंने ब्रेडमेन का रेकार्ड क्यों नहीं तोड़ा? ब्रेडमेन तो विदेशी था। उसका रेकार्ड तोड़ना कठिन था। गावस्कर तो इसी देश का है। उसी का तोड़ कर बताओ। सच यह है कि हम जिस लुग्दी के बने हैं उस पर सिर्फ कविता संकलन छप सकते हैं, नेताओं के भाषण छप सकते हैं। अप्लीकेशन लिखी जा सकती है। अगर हम वे रेकार्ड तोड़ सकते तो भारतीय प्रजातंत्र की कई समस्याएँ भी सुलझा लेते।