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  • Dastak Nayi Peedhi Ki Kavi Sammelan

    Date : 15 November 2009

    Venue : Technia Auditorium, Rohini, New Delhi

    Organizer : Rashtriya Kavi Sammelan

    Occasion : Dastak Nayi Peedhi Ki, Triteeya Kavyotsava

    Poets : Rajgopal Singh, Balvir Singh karun, Lakshmi Shankar Vajpeyee, Naresh Shandilya, Rajesh Chetan, Ritu Goel, Chirag Jain, Yusuf Bharadwaj, Harminder Pal


  • Abhyudaya Kavi Sammelan


    Date : 13 September 2009

    Venue : Indian Islamic Cultural Center, Lodi Road, New Delhi

    Occasion : Alhar Bikaneri Memorial Evening

    Organizer : Abhyudaya

    Poets : Santosh Anand, Savita Aseem, Ashok Chakradhar, Praveen Shukla, Kaleen Kaisar, Mahendra Sharma, Chirag Jain, Dhananjaya Singh, Anil verma Meet, Sarita Sharma, Deepak Gupta, Halchal haryanvi, Nishank, Madhurima Singh, Bekal Utsahi

  • Bhiwani Sanskritik Manch Kavi Sammelan


    Date : 8 August 2009

    Presence : Dr madhav Kaushik

    Occasion : Rajesh Chetan Kavya Puraskar

    Organizers : Sanskritik Manch, Bhiwani

    Poets : Chirag Jain, Baghi Chacha, Hanuman Prasad Agnimukh, Arun Mittal Adbhut, Kalam Bharti, Baljeet Kaur Tanha, Harminder Pal


  • SONE KI BEEMARI : SHAMBHU SHIKHAR

    सोने की बीमारी: शंभू शिखर

    आजकल हम अपने-आप से त्रस्त हैं
    सोने की भयंकर बीमारी से ग्रस्त हैं
    ना मौका देखते हैं, न दस्तूर
    सोते हैं भरपूर

    एक बार सोते-सोते
    इतना टाइम पास हो गया
    कि लोगों को
    हमारे मरने का आभास हो गया।
    वो हमें चारपाई समेत श्मशान उठा लाए
    गहरी नींद में हम भी कुछ समझ नहीं पाए
    जैसे ही
    हमें नहलाने के लिए पानी डाला गया
    हम नींद से जाग गये
    पर लोग हमे भूत समझ कर भाग गये।

    बोर्ड की परीक्षा में
    प्रश्न पत्र मिलते ही सो गये
    आँख तो तब खुली
    जब परीक्षा में फेल हो गये।
    एक बार मंच पे
    कविता पढ़ते-पढ़ते ही सो गये थे
    कुछ पता ही नही चला
    कब हूट हो गये थे।
    सोते सोते ही खाते हैं
    सोते सोते ही नहाते हैं
    कई बार तो उठने से पहले ही
    सो जाते हैं।
    शादी वाले दिन
    पहले फेरे के बाद ही सो गये।
    नींद तब खुली जब दो-दो बच्चे हो गये।

    हमारे पिताजी भी सोने में बड़े तेज थे
    एक बार जब रामलीला में उन्हें
    कुम्भकरण के रोल में सुलाया गया
    फिर तो अगली साल की
    रामलीला में ही उठाया गया।
    दादाजी सोते सोते ही पैदा हुए
    सोते सोते ही मरे थे
    उनकी इस प्रतिभा से सब लोग डरे थे।

    हम तो वंशवाद निभा रहे हैं
    परिवार की सोती परम्परा को
    और सुला रहे है।
    अब तो बस एक ही तमन्ना है
    आयोजक हमें लिफाफे के बदले
    दे दे एक चारपाई
    साथ में रजाई
    हम कविता समाप्त होते ही
    मंच पे सो जायेगें
    आप को अगली बार बुलाना नही पडेगा
    यहीं से उठ कर कविता सुनायेंगे।


  • Khud Se do Baatein


    Date : 9 May 2008

    Venue : Hindi Bhawan, New Delhi

    Organizer : AAS

    Occasion : Book release of KHUD SE DO BAATEIN

    Poets : Rajgopal Singh, Arun gemini, Chirag Jain, Dr Sarita Sharma, Uday Pratap Singh, Sunil Jogi, Rajesh Chetan, Shambhu Shikhar


  • Vikas : Surendra Sharma

    विकास : सुरेन्द्र शर्मा

    एक कमरा था
    जिसमें मैं रहता था
    माँ-बाप के संग
    घर बड़ा था
    इसलिए इस कमी को
    पूरा करने के लिए
    मेहमान बुला लेते थे हम!

    फिर विकास का फैलाव आया
    विकास उस कमरे में नहीं समा पाया
    जो चादर पूरे परिवार के लिए बड़ी पड़ती थी
    उस चादर से बड़े हो गए
    हमारे हर एक के पाँव
    लोग झूठ कहते हैं
    कि दीवारों में दरारें पड़ती हैं
    हक़ीक़त यही
    कि जब दरारें पड़ती हैं
    तब दीवारें बनती हैं!
    पहले हम सब लोग दीवारों के बीच में रहते थे
    अब हमारे बीच में दीवारें आ गईं
    यह समृध्दि मुझे पता नहीं कहाँ पहुँचा गई
    पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
    अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं

    फिर हमने बना लिया एक मकान
    एक कमरा अपने लिए
    एक-एक कमरा बच्चों के लिए
    एक वो छोटा-सा ड्राइंगरूम
    उन लोगों के लिए जो मेरे आगे हाथ जोड़ते थे
    एक वो अन्दर बड़ा-सा ड्राइंगरूम
    उन लोगों के लिए
    जिनके आगे मैं हाथ जोड़ता हूँ

    पहले मैं फुसफुसाता था
    तो घर के लोग जाग जाते थे
    मैं करवट भी बदलता था
    तो घर के लोग सो नहीं पाते थे
    और अब!
    जिन दरारों की वहज से दीवारें बनी थीं
    उन दीवारों में भी दरारें पड़ गई हैं।
    अब मैं चीख़ता हूँ
    तो बग़ल के कमरे से
    ठहाके की आवाज़ सुनाई देती है
    और मैं सोच नहीं पाता हूँ
    कि मेरी चीख़ की वजह से
    वहाँ ठहाके लग रहे हैं
    या उन ठहाकों की वजह से
    मैं चीख रहा हूँ!

    आदमी पहुँच गया हैं चांद तक
    पहुँचना चाहता है मंगल तक
    पर नहीं पहुँच पाता सगे भाई के दरवाज़े तक
    अब हमारा पता तो एक रहता है
    पर हमें एक-दूसरे का पता नहीं रहता

    और आज मैं सोचता हूँ
    जिस समृध्दि की ऊँचाई पर मैं बैठा हूँ
    उसके लिए मैंने कितनी बड़ी खोदी हैं खाइयाँ

    अब मुझे अपने बाप की बेटी से
    अपनी बेटी अच्छी लगती है
    अब मुझे अपने बाप के बेटे से
    अपना बेटा अच्छा लगता है
    पहले मैं माँ-बाप के साथ रहता था
    अब माँ-बाप मेरे साथ रहते हैं
    अब मेरा बेटा भी कमा रहा है
    कल मुझे उसके साथ रहना पड़ेगा
    और हक़ीक़त यही है दोस्तों
    तमाचा मैंने मारा है
    तमाचा मुझे खाना भी पड़ेगा


  • Hasya Kavi Sammelan in Australia

    Date : 8 Apr 2006

    Venue : Australia

    Poets : Shailesh Lodha and Arun Gemini

    Organised by : Ekal Vidyalaya, Australia


  • Aksharam Kavi Sammelan


    Date : 18 January 2005

    Venue : Hindi Bhawan, New Delhi
    Occasion : Pravasi Bhartiya Divas
    Organizer : Aksharam
    Chief Guest : Sushma Swaraj
    Poets : Dr Ashok Chakradhar, Balswarup Rahi, Usha raje, Dr Kunwar Bechain, Titiksha Shah, Rajesh Chetan, Lakshmishankar Vajpayee, Alka Sinha, Krishna Kumar, Mahendra Sharma, Sunil Sahil, Om Vyas Om, Dr Sitesh Alok


  • KAKA HATHRASI PURASKAR / DAINIK JAGRAN


    Occasion : Award function
    Awarded Poet : Mahendra Ajnabi
    Presence : Om Prakash Aditya, Balkavi Bairagi, Dr Govind Vyas, Dr Ashok Chakradhar


  • Kaka Hathrasi Puraskar / Navbharat Times

    Mahendra Ajanabi awarded with kaka hathrasi puraskar in presence of Dr. Ashok Chakradhar & Lakshmimall Singhavi.