डाकिया मिला वृद्ध माँ के स्तनों से दूध बह चला बूढ़ा बाप पाँव थाम पूछने लगा बोलो कैसा मेरा लाडला डाकिये के नैन अश्रु झाड़ते रहे कैसे भर सकेगा उनके कर्ज को वतन प्राण दिए पर न लिया हाथ भर क़फ़न संधियों पे और लोग दस्तख़त करें वे निभा गए हैं देश को दिया वचन प्राण दे के जय वतन पुकारते रहे पूछ रहीं रखियाँ, कलाइयाँ कहाँ बेवा दुल्हनों की शहनाइयाँ कहाँ बालहठ पूछे कब आएंगे पिता गिन-गिन काटें दिन प्यास रक्त की नदी के नीर से बुझी नहीं दानवों की कौम देवताओं से मिली नहीं शांति के कपोत फड़फड़ा के पंख रह गए युद्ध के पिशाच बाज की झपट रुकी नहीं हम अपन का पक्ष ही पुगालते रहे