Jeetne ke baad Baazi haarte Rahe : Aatm Prakash Shukla
जीतने के बाद बाज़ी हारते रहे : आत्मप्रकाश शुक्ल
चीन छीन देश का गुलाब ले गया
ताशकंद में वतन का लाल सो गया
हम सुलह की शक्ल ही सँवारते रहे
जीतने के बाद बाज़ी हारते रहे
सैंकड़ों हमीद ईद पे नहीं मिले
ज्योति दीप ज्योतिपर्व पर नहीं जले
सो गए सिंदूर, मौन चूड़ियाँ हुईं
जो चले गए वे लौट के नहीं मिले
खिड़कियों से दो नयन निहारते रहे
मौत का लिफ़ाफ़ा लिए डाकिया
मिला वृद्ध माँ के स्तनों से दूध बह चला बूढ़ा बाप पाँव थाम पूछने लगा बोलो कैसा मेरा लाडला डाकिये के नैन अश्रु झाड़ते रहे कैसे भर सकेगा उनके कर्ज को वतन प्राण दिए पर न लिया हाथ भर क़फ़न संधियों पे और लोग दस्तख़त करें वे निभा गए हैं देश को दिया वचन प्राण दे के जय वतन पुकारते रहे पूछ रहीं रखियाँ, कलाइयाँ कहाँ बेवा दुल्हनों की शहनाइयाँ कहाँ बालहठ पूछे कब आएंगे पिता गिन-गिन काटें दिन प्यास रक्त की नदी के नीर से बुझी नहीं दानवों की कौम देवताओं से मिली नहीं शांति के कपोत फड़फड़ा के पंख रह गए युद्ध के पिशाच बाज की झपट रुकी नहीं हम अपन का पक्ष ही पुगालते रहे